तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

6 Tweets 4 reads Jul 22, 2024
शिव शिव रटे तो संकट मिटे
🔺 श्रावण मास उत्तम मास कैसे है?
🔺श्रावण मास व्रत कैसे करे?
🔺बेल पत्र का महत्व, तोड़ने का मंत्र, चढ़ाने का मंत्र एवं बेल पत्र कब तोड़े नियम के साथ ?
🔺शिववास का अर्थ एवं विशिष्ट तिथि को महादेव का वास कहाँ होता है ?
महादेव भक्त कृपया #thread पूरा पढ़े
भारत वर्ष में अनादिकाल से विभिन्न पर्व मनाये जाते हैं, एवं भगवान शिव से संबंधी अनेक व्रत-त्यौहार मनाए जाते रहे हैं। इन उत्सवों में श्रावण मास का अपना विशेष महत्व हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुशार श्रावण मास में चार सोमवार कभी-कभी पांच सोमवार होते हैं एक प्रदोष व्रत तथा एक शिवरात्रि शामिल होत हैं इन सबका संयोग एकसाथ श्रावण महीने में होता हैं, इसलिए श्रावण का महीना शिव कृपा हेतु शीघ्र शुभ फल देने वाला मानागया हैं।
🔺शिवपुराण के अनुशार श्रावण माह में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से समस्त तीर्थों के दर्शन का पूण्य एक साथ हि प्राप्त हो जाता हैं।
🔺पद्म पुराण के अनुशार श्रावण माह में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से मनुष्य कि समस्त शुभकामनाएं पूर्ण होती हैं एवं उसे संसार के समस्त सुखों कि प्ताप्ति होकर उसे शिव कृपा से मोक्ष कि प्राप्ति हो जाती हैं।
🔺 प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
🔺 दूसरे सोमवार को सफेद तिल्ल एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
🔺 तीसरे सोमवार को ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
🔺चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
🔺 यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी कच्चा सत्तू चढाया जाता हैं।
शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है। श्रावण मास में शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप करना विशेष लाभ प्रद होता हैं।
श्रावण व्रत कैसे करे
सोमवार के व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने का विधान हैं। विद्वानो के अनुसार श्रावण सोमवार का व्रत-पूजन विधि इस प्रकार हैं। श्रावण सोमवार के दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को सूर्योदय के समय से व्रत प्रारंभ कर लेना चाहिये एवं दिन में एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए। व्रत के दिन शिव पार्वति कि पूजा अर्चना के उपरांत व्रत कि समाप्ति से पूर्व सोमवार व्रत की कथा सुनने का विधान हैं।
🔺श्रावण सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में पूरे घर की साफ-सफाई कर स्नान इत्यादि से निवृत्त हो कर। पूरे घर में गंगा जल छिड़कें।
🔺उठ कर घर में पूजा स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
🔺पूजन की सारी तैयारी होने के बाद निम्न मंत्र से संकल्प लें-
'मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये'
इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें- 'ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
ध्यान के पश्चात 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र से शिवजी का तथा 'ॐ नमः शिवायै' मंत्र से पार्वतीजी का षोडशो उपचार से पूजन करना चाहिये। पूजन के पश्चात श्रावण सोमवार व्रत कथा सुनें। तत्पश्चात आरती कर प्रसाद बाटदे। इसकें पश्चयात हि भोजन या फलाहार ग्रहण करना चाहिये । श्रावण सोमवार व्रत का फल सोमवार व्रत उपरोक्त विधि से करने पर भगवान शिव तथा माता पार्वती कि कृपा बनी रहती हैं। व्यक्ति का जीवन सुख समृद्धि एवं एश्वर्य युक्त होकर व्यक्ति के समस्त संकटो नाश हो जाते हैं।
क्या हैं बेल पत्र अथवा बिल्व-पत्र?
बिल्व-पत्र एक पेड़ की पत्तियां हैं, जिस के हर पत्ते लगभग तीन-तीन के समूह में मिलते हैं। कुछ पत्तियां चार या पांच के समूह की भी होती हैं। किन्तु चार या पांच के समूह वाली पत्तियां बड़ी दुर्लभ होती हैं। बेल के पेड को बिल्व भी कहते हैं। बिल्व के पेड़ का विशेष धार्मिक महत्व हैं। शास्त्रोक्त मान्यता हैं कि बेल के पेड़ को पानी या गंगाजल से सींचने से समस्त तीर्थो का फल प्राप्त होता हैं एवं भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती हैं। बेल कि पत्तियों में औषधि गुण भी होते हैं। जिसके उचित औषधीय प्रयोग से कई रोग दूर हो जाते हैं। भारतिय संस्कृति में बेल के वृक्ष का धार्मिक महत्व हैं, क्योकि बिल्व का वृक्ष भगवान शिव का ही रूप है। धार्मिक ऐसी मान्यता हैं कि बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिव लिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता हैं। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं। पूजन में इसकी मूल यानी जड़ को सींचा जाता हैं।
धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता हैं-
बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्।
यः पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति ।
सर्वतीर्थस्नातः स्यात्स एव भुवि पावनः ॥ (शिवपुराण)
भावार्थ : बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।
🔺बिल्व पत्र तोड़ने का मंत्र बिल्व-पत्र को सोच-समझ कर ही तोड़ना चाहिए। बेल के पत्ते तोड़ने से पहले निम्न मंत्र का उच्चरण करना चाहिए-
अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियः सदा।
गृह्यामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात् ॥ -(आचारेन्दु) भावार्थ : अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।
🔺कब न तोड़ें बिल्व कि पत्तियां? विशेष दिन या विशेष पर्वो के अवसर पर बिल्व के पेड़ से पत्तियां तोड़ना निषेध हैं। शास्त्रों के अनुसार बेल कि पत्तियां इन दिनों में नहीं तोड़ना चाहिए- बेल कि पत्तियां सोमवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
बेल कि पत्तियां चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथियों को नहीं तोड़ना चाहिए।
बेल कि पत्तियां संक्रांति के दिन नहीं तोड़ना चाहिए। अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे
। बिल्वपत्रं न च छिन्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत ॥ (लिंगपुराण)
भावार्थ: अमावस्या, संक्रान्ति के समय, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों तथा सोमवार के दिन बिल्व-पत्र तोड़ना वर्जित है। चढ़ाया गया पत्र भी पूनः चढ़ा सकते हैं? शास्त्रों में विशेष दिनों पर बिल्व पत्र तोडकर चढ़ाने से मना किया गया हैं तो यह भी कहा गया है कि इन दिनों में
चढ़ाया गया बिल्व-पत्र धोकर पुन : चढ़ा सकते हैं।
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुनः पुनः। शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि चित्॥ (स्कन्दपुराण)
भावार्थ: अगर भगवान शिव को अर्पित करने के लिए नूतन बिल्व-पत्र न हो तो चढ़ाए गए पत्तों को बार-बार धोकर चढ़ा सकते हैं। बेल पत्र चढाने का मंत्र भगवान शंकर को विल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य कि सर्वकार्य व मनोकामना सिद्ध होती हैं। श्रावण में विल्व पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व शास्त्रो में बताया गया हैं।
विल्व पत्र अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्मपापसंहार, विल्वपत्र शिवार्पणम् त्रिदलं
भावार्थ: तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं।
भगवान शिव को बिल्व-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
शिववास विचार
: तिथिं च द्विगुणी कृत्यपंचाभिश्च समन्तितम्।। सप्तभिस्तुहरीभ्दिगंशेषं शिववास उच्चयते ।।
सके कैलाश वासंचद्वितीयं गौरिन्नि हो।।
तृतीये वृषभारूढ़ चतुर्थे च समास्थित
पंचमे भोजनेचैव क्रीडायान्तुरसात्मके।। शून्येश्मशानकेचैव शिववासंच योजयेत्।।
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा (१), अष्टमी (८), अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया (२)व नवमी (९) के दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि अवश्य प्राप्त होती हैं।
🔺कृष्णपक्ष की चतुर्थी (४), एकादशी (११) तथा शुक्लपक्ष की पंचमी (५) व द्वादशी (१२) तिथियों में भगवान शिव कैल पर्वत पर निवास करते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से परिवारी सुख में वृद्धि होती हैं।
🔺कृष्णपक्ष की पंचमी (५), द्वादशी (१२) तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी (६) व त्रयोदशी (१३) तिथियों में भगवान शिव नंदी सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से अभीष्ट कार्य सिद्ध होता है।
🔺कृष्णपक्ष की सप्तमी (७), चतुर्दशी (१४) तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (१), अष्टमी (८), पूर्णिमा (१५) में भगवान शि श्मशान में ध्यान रत रहते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से कार्य में सिद्ध नहीं होता व यजमान पर महाविप आने की संभावना अधिक हो जाती हैं।
🔺 कृष्णपक्ष की द्वितीया (२), नवमी (९) तथा शुक्लपक्ष की तृतीया (३) व दशमी (१०) में भगवान शिव देवलोक देवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से संताप अर्थात दुःख में वृद्धि होती हैं
🔺कृष्णपक्ष की तृतीया (३), दशमी (१०) तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी (४) व एकादशी (११)में भगवान शिव क्रीडारत रहते इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चनसंतान को कष्ट दे सकता है।
🔺कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेवभोजन करते हैं, तिथि में रुद्राभिषेक करने से पीडाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
नोटः शिववास का विचार निर्धारित कार्य की पूर्ति हेतु अथवा अभिष्ट कामनाओं की पूर्ति हेतु विचार किया जाता निष्काम भाव से की जाने वाला शिव पूजा-अर्चना अथवा रुद्राभिषेक हेतु शिववास विचार करने की आवश्यका नही होती।
(द्वादशज्योतिलिंग क्षेत्र एवं तीर्थ स्थान में तथा शिवरात्रि, प्रदोष, सावन के सोमवार-इत्यादि विशेष शुभ-अवसरो अथवा पर्वो में शिववास विचार करने की आवश्यका नहीं होती।)

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