तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

4 Tweets 13 reads Apr 04, 2024
कवच, सहस्त्र नाम, स्तोत्र अलग अलग क्यूँ है किस कार्य की पूर्ति हेतु इनका पाठ बना हुआ है ?
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1. कवच- 'कव' ग्रहणे धातु से निष्पन्न यह शब्द बनता है। आन्तरिक कामनाओं की रक्षा हेतु एवं नियन्त्रण रखने के लिए 'कवच' की आवश्यकता है। यह कवच पाठद्वारा देवताओं का साधक के समस्त शरीर के अवयवों तथा दिशाओं में न्यास करने से सहज साध्य है।क्योंकि लौकिक दृष्टि से कोई भी योद्धा अपने अंग-प्रत्यंगों की रक्षा के लिए युद्ध में जाने से पहले कवच धारण करता हो है।
पृथक् तत्त्वों का पारस्परिक सम्बन्ध और आकर्षण काम शक्ति पर आधारित है। इस प्राकृतिक शक्ति का सभी जीवित प्राणियों में निवास है, इसके द्वारा जहां अनंत सुख प्राप्त होता है, वहीं अत्यन्त पीड़ा भी उत्पन्न होती है। इसीलिए इसे पशु-प्रकृति कहा है। इस पर नियन्त्रण रखने के लिए प्राचीन महर्षियों ने सर्वाधिक बल दिया है और इसके अनेक उपाय भी बतलाए है। कवच-पाठ पूर्वक वैसी भावना से यह सहज सम्भव है। कुत्सित भावनाओं और अनिष्ट परिणामों से सुरक्षा प्राप्त करने का सहज उपाय 'प्राणिमात्र में देवत्व बुद्धि रखना और स्वयं को देव रूप मानना' है। यह कवच-पाठ से प्राप्य है।
कवच के प्रयोग की विशाएं- प्रत्येक देवता के कवच के अन्त में फलश्रुति दी जाती है जिसमें लिखा रहता है कि-
१. इस कवच के पाठ से रक्षा होती है।
२. इसको किसी विशिष्ट पर्व पर भूर्जपत्र आदि लेख्य वस्तु पर स्याही आदि से लिखकर धारण करना चाहिए।
३. कवच- पाठ का पुरश्चरण ।
४. कवच-पाठ द्वारा भस्माभिमन्त्रण, जलाभिमन्त्रण कवच (ताबीज) निर्माण,
५. कवच द्वारा अभिमार्जन,
६. वस्त्रादि से झाड़ना आदि।
इनके अतिरिक्त एक प्राचीन हस्तलिखित पद्धति से यह भी प्राप्त हुआ है कि कवच-पाठ में अन्य सूक्तों और प्रत्येक स्थान की रक्षा के लिए प्रार्थित देवता के मन्त्रों का जप भी इसमें किया जाता है। इसे 'कवचीकरण' कहा जाता है। 'कवची-मन्त्रगणों' का शास्त्रीय प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली होता है।इसीलिए दुर्गासप्तशती के 'ब्रह्मकवच' के अन्त में कहा गया है कि-
पदमेकं न गच्छेद् वं यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कवची भव सर्वदा ॥
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रापि गच्छति ।
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः ।
2. सहस्रनाम-आराध्य देवता के एक सहस्र, अष्टोत्तर सहस्र अथवा अधिक नामों का संग्रह 'सहस्रनाम' कहलाता है। यह संग्रह किसी विशेष दृष्टि से चुने हुए नामों की परिणति है। इनका सम्बन्ध शरीरस्थ अन्तर्नाडियों से भी माना गया है। ७० हजार नाड़ियों वाले देह में सहस्रनाड़ियों की प्रमुखता होने से उनका प्रबोधन इन नामों के स्मरण से होता है। कन्दाकार में प्रसुप्त इन नाड़ियों का प्रबोधन होने से साधना में सफलता मिलती है। मस्तक में स्थित सहस्रदल-कमल की पंखुड़ियों से भी इसका सम्बन्ध है। उसे मानें तो इनके स्मरण से अमृत की प्राप्ति होती है, ऐसा समझना चाहिए। जैसे वृक्ष में मूल से शिखा- पर्यन्त एक ही रस व्याप्त रहता है, परन्तु पत्त्र, शाखा और पुष्पादि नाना रूपों में वृक्ष व्यक्त होता है, उसी प्रकार विश्व में एक हो शक्ति नाना रूपों में प्रकट होती है, उसी को महाशक्ति कहते हैं। वे विभक्त स्वरूप मूल में एक होने के कारण पुनः एक होने का प्रयास करते हैं। वस्तुओं के पारस्परिक भौतिक और मानसिक विघटन-संघटन में यही एक से अनेक और अनेक से एक हो जाने की इच्छा मूल कारण है। इसी इच्छा का नाम शक्ति है। एक से अनेक और अनेक से एक होने की इच्छा जिस सर्वोच्च सत्ता की है, उसी के आधार पर यह विश्व व्यापार चल रहा है। उसी सर्वोच्च सत्ता का सहस्रों नामों से ज्ञानी, विद्वान् साधक स्तवन करते हैं। ऐसे स्तवनों से मन धीरे-धीरे निर्मल होता है तथा उसमें मूल शक्ति के प्रति भक्ति-प्रीति उत्पन्न होती है जिसके द्वारा इस संसार से निस्तार अथवा पुनः उस सत्ता में लय सम्भव है।
ये सहस्रनाम ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार अनिष्ट- कारिणी ग्रहदशा, अन्तर्दशा आदि में अनिष्टों की शान्ति एवं ईश्वर- कृपा-प्राप्ति के अन्यतम उपाय हैं।
'तद्दोषपरिहार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत्, शिवसाहस्रकं जपेत्, सूर्वसाहस्रकं जपेत्'
आदि वचन इसके प्रमाण है।
सहस्रनामार्चन की विधि से- अयुतचंन, लक्षार्चन और कोट्ह्वर्चन की विधियां बनी हैं, दीपाचन के प्रयोग भी मिलते हैं और विभिन्न काम्य- प्रयोग भी इनके द्वारा किए जाते हैं जिन्हें हम फलश्रुति और अन्य आगम ग्रन्थों से प्राप्त कर सकते हैं।'
3. स्तोत्र
स्तोत्र स्तोकेन मनसः परमप्रोतिकारणात् । स्तोवसन्तरणाद् देवि ! स्तोत्रमित्यभिधीयते ।।
इसके अनुसार स्तोत्र से मन की प्रसन्नता, कष्टों से सन्तरण एवं इष्ट देव की प्रीति-कृपा प्राप्त होती है। स्तोत्र में देवता का गुणानुवाद, आत्मनिवेदन तथा इच्छा सम्प्राप्ति की प्रार्थना तो रहते ही है, साथ ही उनमें देवता सम्बन्धी बीजमन्त्र, तन्त्र, यन्त्र और विधान भी रहते हैं, जिनका अभिप्राय यह रहता है कि स्तोत्र पाठ के साथ ही मन्त्रजपादि भी होते रहें। स्तोत्र पाठ से श्रद्धा जागृत होती है, आत्मविश्वास दृढ़ होता है और इन दोनों के आधार से बुद्धि और निर्णय का बल प्राप्त होता है। मानसिक शक्ति के विकास का यही मूल आधार है। अतः स्तोत्र पाठ को उपासना में महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है

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