तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

2 Tweets 18 reads Nov 27, 2023
कुंडली के अनिष्ट योग उपाय केवल शिव उपासना
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कुंडली के अनिष्ठ दशा योग एवं शिवोपासना उपाय
हमारे पवित्र ज्योतिष शास्त्र में जातक की जन्मकुण्डली के अनुसार मिलनेवाले सुख दुःखों की फलप्राप्ति में काल-निर्णय का बड़ा महत्त्व है, जिन्हें ग्रहों की दशाओं, अन्तर्दशाओं तथा गोचर आदि के माध्यम से जाना जाता है । अन्तर्दशादि-भेदों से युक्त सभी दशाएँ प्राणियों के शुभाशुभ- मिश्रफलानुभव की प्राप्ति को दिग्दर्शित करती हैं। इसी कारण ज्योतिष शास्त्र में महादशा तथा अन्तर्दशा का महत्त्व है।
'बृहत्पाराशरहोराशास्त्र' नामक ग्रन्थ में प्रायः चालीस प्रकार की दशाओं की चर्चा है, किंतु व्यवहार में विंशोत्तरी, अष्टोत्तरी तथा योगिनी दशा का विशेष चलन है। ज्योतिर्विद् स्थान अथवा विश्वास के भेद से इन दशाओं को स्वीकार करते हैं। फिर भी कलियुग में विंशोत्तरी दशा की प्रधानता स्वीकार की गयी है। इन महादशाओं में अन्तर्दशाएँ. प्रत्यन्तर्दशाएँ तथा सूक्ष्म, प्राण आदि अनेक दशाएँ अन्तर्भुक्त होती हैं; जिनका फलित ग्रन्थों में बहुत विस्तार से विचार हुआ है। यहाँ केवल इतना ही बतलाना है कि कौन-सी दशा अन्तर्दशा में अनिष्टकारक योग होने पर भगवान् शिव की उपासना करनी चाहिये। उदाहरण मात्र कुछ अंश यहाँ दिये जा रहे हैं-
💫 1- सूर्य की महादशा में सूर्य की अनिष्टकारक अन्तर्दशा हो तो उस दोष की निवृत्ति के लिये मृत्युञ्जयमन्त्र का जप करना चाहिये । उदाहरण के लिये कर्क एवं कुम्भ लग्नोत्पन्न जातक के लिये सूर्य में सूर्य का अन्तर होने पर भारी संकट या मृत्युसम कष्ट होता है ऐसे समय में मृत्युञ्जय मंत्र का जप करना चाहिये। इससे समस्त दोषों की निवृत्ति हो जाती है और भगवान् शिव एवं ग्रहराज सूर्यदेव का अनुग्रह प्राप्त होता है.
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् ।।
सूर्यप्रीतिकरी शान्तिं कुर्यादारोग्यमादिशेत् ।
इसी प्रकार सूर्य की महादशा में शनि एवं केतु की अन्तर्दशा होने पर मृत्युञ्जय मन्त्र का अनुष्ठान करने से अपमृत्यु का निवारण होता है-
'मृत्युंजयजपं चरेत् ।'
सूर्य की महादशा में चन्द्र की अन्तर्दशा के समय चन्द्रमा यदि सूर्य से 6ठें, 8वें, 12वें दूसरे भाव अर्थात् मारक स्थान एवं स्थान पर हो तो कुफल प्राप्त होते हैं। धन का नाश, अनेक प्रकार के रोग एवं व्याधियाँ, कष्ट, पीड़ा, विपत्तियाँ एवं शत्रु बढ़ जाते हैं, इनकी शान्ति के लिये भगवान् शिव की बिल्वपत्रों से पूजा तथा सोमवार का व्रत रखें।
💫 2- चन्द्रमा की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा होने पर यदि अनिष्टकारक योग हो तो अपमृत्यु होती है, इसलिये इस दोष की निवृत्ति के लिये शिवसहस्रनाम का जप करना चाहिये -
'तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रक जपेत् ।
शनि की अन्तर्दशा होने पर शरीर में कष्ट होता है, जिसके लिये मृत्युंजयमन्त्र का जप करना चाहिये। चन्द्रमा में केतु की अन्तर्दशा में भय होता है तथा शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं, इसके निवारण हेतु मृत्युंजय मन्त्र का जप करना चाहिये-
'मृत्युंजयं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।'
इसी प्रकार चन्द्र में शुक्र की अन्तर्दशा में तथा सूर्य की अन्तर्दशा में क्रमश: रुद्र जाप तथा शिवपूजन करना चाहिये-
'तद्दोषविनिवृत्त्यर्थं रुद्रजापं च कारयेत्
तद्दोषपरिहारार्थं शिवपूजां च कारयेत्।'
चन्द्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा की अवस्था में अगर राहु मारक स्थान 2 या 7 में हो तो जातक मृत्युतुल्य कष्ट भोगता हैं। इस अरिष्ट की शान्ति के लिये एक श्रेष्ठ उपाय रुद्राभिषेक है।
💫 3- मंगल की महादशा में, मंगल की अन्तर्दशा में रुद्र जप तथा वृषभदान करना चाहिये। राहु की अन्तर्दशा होने पर नाग का दान, ब्राह्मण- भोजन तथा मृत्युंजयमन्त्र का जप करने या कराने से आयु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है-
नागदानं प्रकुर्वीत देवबाह्मणभोजनम् ।
मृत्युंजयजपं कुर्यादायुरारोग्यमादिशेत् ॥
मंगल में बृहस्पति की खराब अन्तर्दशा होने पर शिवसहस्रनामावली का जप करना चाहिये-
'तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रक जपेत्।'
इसी प्रकार शनि की दोषयुक्त अन्तर्दशा में मृत्युंजय मन्त्र के जप का विधान है।
💫 4- राहु की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा दोषकारक होने पर अपमृत्यु की सम्भावना रहती है, इसलिये ऐसी अवस्था में स्वर्णप्रतिमा का दान तथा शिवपूजन करना चाहिये -
'स्वर्णस्य प्रतिमादानं शिवपूजां च कारयेत्।'
💫 5- बृहस्पति की महादशा में अनिष्टकारक बृहस्पति के योग होने पर शिवसहस्रनाम का जप, रुद्र जप तथा गोदान करने से सुख- शान्ति की प्राप्ति होती है-
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रक जपेत्।
रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यादिष्टं समाप्नुयात्।।'
इसी प्रकार राहु की अन्तर्दशा होने पर मृत्युंजयमन्त्र के जप का विधान है।
💫 6- शनि की महादशा में शनि तथा राहु की खराब अन्तर्दशा होने पर मृत्युंजय मन्त्र का जप करना या कराना चाहिये। इसी बृहस्पति की अनिष्टकारक अन्तर्दशा होने पर शिवसहस्रनाम का जप तथा स्वर्ण - दान करना चाहिये। इससे आरोग्य प्राप्त होता है और सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं-
तद्दोषपरिहार्थं शिवसाहस्रक जपेत् ।
स्वर्णदानं प्रकुर्वीत ह्यारोग्यं भवति धुवम् ।।
💫 7- बुध की महादशा में मंगल, बृहस्पति एवं शनि की अन्तर्दशा यदि ठीक न हो तो वृषभ- दान और मृत्युंजय मन्त्र तथा शिवसहस्रनाम के जप करने से अपमृत्यु का निवारण होता है तथा सर्वसौख्य प्राप्त होता है-
अनड्वाहं प्रकुर्वीत मृत्युंजयजपं चरेत् ।
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसा जपेत् ।।
💫 8- केतु की महादशा सात वर्ष तक रहती है। इस सात वर्ष में निश्चित क्रम से सभी ग्रह अपना समय अन्तर्भुक्त करते हैं। केतु में केतु तथा बृहस्पति ग्रह की दोषकर अन्तर्दशा रहने पर स्वास्थ्य हानि तथा आत्मबन्धु से वियोग और अपमृत्यु होती है, ऐसी स्थिति में मृत्युंजय जप तथा शिवसहस्रनाम का पाठ करने से सभी दुर्योग दूर हो जाते हैं-
तद्दोषपरिहार्थं शिवसाहस्रस्कं जपेत् ।
महामृत्युंजय जाप्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥
💫 9- शुक्र ग्रह की महादशा में दोषयुक्त राहु, बृहस्पति तथा केतु की अन्तर्दशा में मृत्युंजय मन्त्र के जप करने से अपमृत्यु दूर होती है और सौख्य प्राप्त होता है तथा भगवान् शंकर की प्रसन्नता प्राप्त होती है-
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् ।
उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनिष्टकारक दुर्योगों में भगवान् शंकर की सहस्रनामावली के पाठ, श्रीमहामृत्युंजय मन्त्र के जप, रुद्राष्टाध्यायीका पाठ, शिवलिङ्गार्चन, अभिषेक, स्तोत्र- पाठ, सोमवारव्रत अथवा अन्य जिस किसी भी साधन से आशुतोष है। और सभी दिव्य सुखभोग प्राप्त हो जाते हैं और सबसे बड़ी बात भगवान् के श्रीचरणों में अखण्ड प्रीति भी प्राप्त हो जाती है।
मारकेश ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में तो प्राय: महामृत्युंजय मन्त्र के जप का विधान निर्दिष्ट है, क्योंकि महादेव होने से भगवान् सदाशिव काल के भी महाकाल महानियन्ता हैं। महर्षि मार्कण्डेयजी ने भी अत्यल्प आयु का योग जानकर भगवान् शिव की शरण ग्रहण की थी और उनकी
'चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः'
में अटूट निष्ठा थी। भगवान् के शरणापन्न होने पर तो वे सदा रक्षा-सुरक्षा करते ही हैं। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के आश्रय से काल का सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर द्वन्द्वों से बिना विचलित हुए निन्द्य कर्मों का सर्वथा परित्याग कर सदाचरण द्वारा भगवान् श्रीशिव की उपासना करते हुए अपने लोक- परलोक के सुधार का प्रयत्न करना चाहिये।
ॐ नम: शिवाय 🙏🚩

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