आचार्यों ने कहा है कि मनुष्य एकाग्रचित्त निश्चल दृष्टि से किसी सूक्ष्म लक्ष्य अथवा लघु पदार्थ को
तब तक देखें जब तक कि अनुपात ना हो जाये।
त्राटक तीन प्रकार के कहे गये है
१. बाह्य त्राटक -चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, व दूरवर्ती लक्ष्य पर दृष्टि रखकर त्राटक करे तो वह बाह्यत्राटक कहलाता
तब तक देखें जब तक कि अनुपात ना हो जाये।
त्राटक तीन प्रकार के कहे गये है
१. बाह्य त्राटक -चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, व दूरवर्ती लक्ष्य पर दृष्टि रखकर त्राटक करे तो वह बाह्यत्राटक कहलाता
है। जिस साधक की पित्त प्रधान प्रकृति हो, नेत्र कमजोर हो, नेत्र में फूला, जाला, या अन्य रोग हो वह यह जाटक नहीं करे।
२. मध्य त्राटक- काली स्याही से कागज पर लिखे हुये ॐ बिन्दु देवमूर्ति अथवा समीप लक्ष्य या मोमबत्ती, तिल के तेल की अचल बत्ती, लैम्प बत्ती के प्रकाश से प्रकाशित
२. मध्य त्राटक- काली स्याही से कागज पर लिखे हुये ॐ बिन्दु देवमूर्ति अथवा समीप लक्ष्य या मोमबत्ती, तिल के तेल की अचल बत्ती, लैम्प बत्ती के प्रकाश से प्रकाशित
धातुमूर्ति पर त्राटक करने को मध्य त्राटक कहते
है। जिनकी नेत्र ज्योति पूर्ण हो, त्रिधातु सम हो, कफ प्रधान प्रकृति होवे वह इस त्राटक को करे।
३. आन्तर त्राटक- आन्तर शटक व ध्यान में बहुत कुछ समानता है। हृदय अथवा भूमध्य में नेत्र बन्द कर एकाग्रता पूर्वक चक्षुवृति की भावना को आन्तर
है। जिनकी नेत्र ज्योति पूर्ण हो, त्रिधातु सम हो, कफ प्रधान प्रकृति होवे वह इस त्राटक को करे।
३. आन्तर त्राटक- आन्तर शटक व ध्यान में बहुत कुछ समानता है। हृदय अथवा भूमध्य में नेत्र बन्द कर एकाग्रता पूर्वक चक्षुवृति की भावना को आन्तर
त्राटक कहा जाता है। भूमध्य में आन्तर त्राटकर करने से आरम्भ के कुछ दिन कपाल में दर्द हो सकता है, नेत्र में चञ्चलता प्रकट होगी, परन्तु कुछ समय बाद नेत्रवृति सामान्य हो जाती है।
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