वासुकी के फूत्कार से हवाओं में भारीपन आ गया। मथानी का वेग चरम पर पहुँच गया, हर हर करते हुए पानी से नीला द्रव्य निकला,साँस खींचने में परेशानी होने लगी। बुदबुदे विशाल होने लगे।
सागर ने जहर उगल दिया। वायु अवरुद्ध हो गयी, जल के जीव जंतु तड़पने लगे। दिग्गज चिक्कारने लगे।
सागर ने जहर उगल दिया। वायु अवरुद्ध हो गयी, जल के जीव जंतु तड़पने लगे। दिग्गज चिक्कारने लगे।
देव और दानव प्राण बचाने के लिए वहाँ से भाग परमपिता ब्रह्मा के पास पहुँचे।
यह कालकूट विष है, इसे शमन करने की क्षमता संसार में किसी के पास नही है। ब्रह्मवाणी गूंजी।
तो क्या आज प्रलय की घड़ी आ पहुँची परमपिता ? देवेंद्र ने प्रश्न किया।
यह कालकूट विष है, इसे शमन करने की क्षमता संसार में किसी के पास नही है। ब्रह्मवाणी गूंजी।
तो क्या आज प्रलय की घड़ी आ पहुँची परमपिता ? देवेंद्र ने प्रश्न किया।
हाँ, पर तुम लोग यदि महादेव के पास जाकर उनसे प्रार्थना करो तो शायद वह तुम्हारी रक्षा करें, क्योंकि महाकाल उनके अधीन है वह विष को अमृत बनाने की कला जानते हैं, गले मे नाग धारण करने वाले ही कोई रास्ता बताएंगे। ब्रह्मा जी ने कहा।
सारे लोग कैलाश भागे, भोलेनाथ के गण प्रहसन खेल रहे थे,
सारे लोग कैलाश भागे, भोलेनाथ के गण प्रहसन खेल रहे थे,
माँ सती हँस रहीं थीं। अचानक हाँफते हुए देव दानवों को देख भोलेनाथ ने प्रहसन को रोका और सबके आने का कारण पूछा। कालकूट के उत्पन्न होने और उसके कारण चराचर के जीवन और आये संकट को सुना फिर त्रिशूल उठाया और सती से बोल चल निकले
सागर मंथन स्थल पर पहुंचने देखा नीला विष विस्तार लेता जा रहा
सागर मंथन स्थल पर पहुंचने देखा नीला विष विस्तार लेता जा रहा
आदि योगी ने तांडव करना शुरू किया, सागर में विशाल भँवर पड़ने लगी, डमरू की विशेष आवृत्ति लयध्वनि से समस्त विष एक जगह इकट्ठा होता गया। महादेव ने त्रिशूल गाड़ा और अंजुरी भर भर विषपान करने लगे।
“कर्पूर गौरम करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारं” के उद्घोष से समस्त वातावरण गुंजित हो
“कर्पूर गौरम करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारं” के उद्घोष से समस्त वातावरण गुंजित हो
उठा। विष को कंठ में धारण करते नीलकंठ का ताप बढ़ता जा रहा था। ताप इतना बढ़ गया कि उस स्थान का जल वाष्पित होने लगा।
भगवान शिव को ताप में देखकर परमपिता ब्रह्मा ने अपने कमंडल से गंगा की धार से उनके ललाट पर धार देकर अभिषेक करने लगे,
भगवान शिव को ताप में देखकर परमपिता ब्रह्मा ने अपने कमंडल से गंगा की धार से उनके ललाट पर धार देकर अभिषेक करने लगे,
बादलों के भीतर से मंदाकिनी (माँ गंगा) हर-हर करते महादेव की जटाओं पर गिरने लगीं, यह देख समस्त देव दानव कांवर में गंगाजल भर भगवान शिव के मस्तक का जलाभिषेक करने लगे। गंगा का स्पर्श पाकर शिव का ताप शीतल पड़ने लगा । कालकूट का प्रभाव शमित हो गया,
वासुकी को महादेव ने स्पर्श किया, वह चैतन्य हुआ। दिग्गज शांत हुए, कूर्मावतार भगवान विष्णु मुस्कुराये। चराचर के हित के लिए कालकूट पीने वाले महादेव की जयघोष से तीनों लोक भर गए।
“चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं ,प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं |
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं ,प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि “
भावार्थ:-
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं ,प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि “
भावार्थ:-
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए
और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकर जी को मैं भजती हूँ॥4॥
हर हर महादेव 🙏🏻🔱🚩
हर हर महादेव 🙏🏻🔱🚩
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