7 تغريدة 1 قراءة Jul 11, 2023
मुझे लगता है कि भारत में दलित आदिवासी और पिछड़े वर्गों में #राजनीतिक_चेतना शून्य बराबर है।
यही कारण है कि ...#भीमा_कोरेगांव और #चैत्यभूमि आदि में हर साल लाखों की भीड़ खड़े करने वाले व ख़ुद को क्रांतिकारी और अंबेडकरवादी बताने वाले लोगों के पास आजतक ..
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#महाराष्ट्र के 48 सांसदों व 288 विधायकों में 10% #सीट भी जिताने का दम कभी बन पाया है। और ना ही दलितों के स्वतंत्र नेतृत्व के नाम पर 10% #वोट लाने का दम कभी बन पाया है।
इसका कारण है.. दलित समाज के लोग अपने ही बड़े नेताओं को बौना साबित करने में जी जान से लगे रहते है।
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इन स्वघोषित क्रांतिकारियों को कौन समझाए कि #राजनीतिक_पार्टी और #सामाजिक_संगठन में बहुत से बुनियादी अंतर होते है। जो काम कोई संगठन बिंदास कर देता है, वो काम राजनीतिक पार्टी अक्सर नही कर पाती।
इसलिए उजूल फिजूल बकवास करने से बेहतर है कि आप तथ्यों को काउंटर करें।
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ये बात सबकी समझ में आ जानी चाहिए कि #छोटी_छोटी_पार्टियां बनाकर ख़ुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष कहने से ... ,,
या बिना बात मूंछों पर मरोड़ी देते रहने से .. #ना मूंछ #लम्बी होती है और #ना ही किसी समस्या का #समाधान निकलता है।
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अपनी पार्टी बनाकर #बहुत लोग #राष्ट्रीय_अध्यक्ष बन चुके है, लेकिन वो पिछले 75 सालों में अपनी #जमानत तक नही बचा पाए है।
कोई कुछ भी कहो, इतनी कम आबादी के बावजूद जो राजनीति की समझ और राजनीतिक चेतना ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य समाज में है ऐसी राजनीतिक चेतना दलित आदिवासी पिछड़ों में
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ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य जैसी राजनीतिक चेतना दलित, आदिवासी और पिछड़ों में आने में कम से कम #100_साल लग जाएंगे।
भारत सही मायने में लोकतंत्र की समझ वाला देश तब माना जाना चाहिए जब इसके हर वर्ग को बिना किसी हो हल्ला के आबादी के अनुपात में प्रतिनिधि चुनने की समझ विकसित हो जाएं।
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#जब_तक हर वर्ग यानी दलित आदिवासी पिछड़े मुस्लिम बौद्ध सिक्ख ईसाई को आबादी के अनुपात के आसपास अपने नुमाइंदे चुनने की #समझ विकसित नही हो जाती..
तब तक #मौजूदा लोकतंत्र को वोटों से चुनी गई #राजशाही कहना बहुत ग़लत नही है।
जयभीम 🙏
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@RK14507287

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