स्नान नियम क्या होते है....?
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भोजनके बाद, रोगी रहनेपर, महानिशा (रात्रिके मध्य दो पहर)- में, बहुत वस्त्र पहने हुए और अज्ञात जलाशयमें स्नान नहीं करना चाहिये ।
रातके समय स्नान नहीं करना चाहिये । सन्ध्याके समय भी स्नान नहीं करना चाहिये । परन्तु सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय रात्रिमें भी स्नान कर सकते हैं।
पुत्रजन्म, सूर्य की संक्रान्ति, स्वजन्म की मृत्यु, ग्रहण तथा जन्म-नक्षत्र में चन्द्रमा रहने पर रात्रि में भी स्नान किया जा सकता है।
बिना शरीरकी थकावट दूर किये और बिना मुख धोये स्नान नहीं करना चाहिये।
सूर्यकी धूपसे सन्तप्त व्यक्ति यदि तुरन्त ( बिना विश्राम किये) स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और सिरमें पीड़ा होती है।
काँसेके पात्रसे निकाला हुआ जल कुत्तेके मूत्रके समान अशुद्ध होनेके कारण स्नान और देवपूजाके योग्य नहीं होता । उसकी शुद्धि पुनः स्नान करनेसे ही होती है।
पुरुषको नित्य सिरके ऊपरसे स्नान करना चाहिये । सिरको छोड़कर स्नान नहीं करना चाहिये। सिरके ऊपरसे स्नान करके ही
देव कार्य तथा पितृकार्य करने वाले ।
बिना स्नान किये कभी चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिये ।
रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, व्रत- उपवास, अमावस्या, षष्ठी तिथि अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्यको गर्म जलसे स्नान करना चाहिये
जो दोनों पक्षोंकी एकादशीको आँवलेसे स्नान करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह विष्णुलोक में सम्मानित होता है।
स्नानके बाद अपने अंगोंमें तेलकी मालिश नहीं करनी चाहिये तथा गीले वस्त्रोंको झटकारना नहीं चाहिये ।
स्नान के बाद अपने गीले बालोंको फटकारना (झाड़ना) नहीं चाहिये ।
स्नानके बाद वस्त्रको चौगुना करके निचोड़े, तिगुना करके नहीं। घरमें वस्त्र निचोड़ते समय उसके छोरको नीचे करके निचोड़े और नदीमें स्नान किया हो तो ऊपरकी ओर छोर करके भूमिपर निचोड़े । निचोड़े हुए वस्त्रको कन्धेपर न रखे ।
स्नानके बाद हाथोंसे शरीरको नहीं पोंछना चाहिये ।
स्नानके समय पहने हुए भीगे वस्त्रसे शरीरको नहीं पोंछना चाहिये। ऐसा करनेसे शरीर कुत्तेसे चाटे हुएके समान अशुद्ध हो जाता है, जो पुनः स्नान करनेसे ही शुद्ध होता है।
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भोजनके बाद, रोगी रहनेपर, महानिशा (रात्रिके मध्य दो पहर)- में, बहुत वस्त्र पहने हुए और अज्ञात जलाशयमें स्नान नहीं करना चाहिये ।
रातके समय स्नान नहीं करना चाहिये । सन्ध्याके समय भी स्नान नहीं करना चाहिये । परन्तु सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय रात्रिमें भी स्नान कर सकते हैं।
पुत्रजन्म, सूर्य की संक्रान्ति, स्वजन्म की मृत्यु, ग्रहण तथा जन्म-नक्षत्र में चन्द्रमा रहने पर रात्रि में भी स्नान किया जा सकता है।
बिना शरीरकी थकावट दूर किये और बिना मुख धोये स्नान नहीं करना चाहिये।
सूर्यकी धूपसे सन्तप्त व्यक्ति यदि तुरन्त ( बिना विश्राम किये) स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और सिरमें पीड़ा होती है।
काँसेके पात्रसे निकाला हुआ जल कुत्तेके मूत्रके समान अशुद्ध होनेके कारण स्नान और देवपूजाके योग्य नहीं होता । उसकी शुद्धि पुनः स्नान करनेसे ही होती है।
पुरुषको नित्य सिरके ऊपरसे स्नान करना चाहिये । सिरको छोड़कर स्नान नहीं करना चाहिये। सिरके ऊपरसे स्नान करके ही
देव कार्य तथा पितृकार्य करने वाले ।
बिना स्नान किये कभी चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिये ।
रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, व्रत- उपवास, अमावस्या, षष्ठी तिथि अथवा अशौच प्राप्त होनेपर मनुष्यको गर्म जलसे स्नान करना चाहिये
जो दोनों पक्षोंकी एकादशीको आँवलेसे स्नान करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह विष्णुलोक में सम्मानित होता है।
स्नानके बाद अपने अंगोंमें तेलकी मालिश नहीं करनी चाहिये तथा गीले वस्त्रोंको झटकारना नहीं चाहिये ।
स्नान के बाद अपने गीले बालोंको फटकारना (झाड़ना) नहीं चाहिये ।
स्नानके बाद वस्त्रको चौगुना करके निचोड़े, तिगुना करके नहीं। घरमें वस्त्र निचोड़ते समय उसके छोरको नीचे करके निचोड़े और नदीमें स्नान किया हो तो ऊपरकी ओर छोर करके भूमिपर निचोड़े । निचोड़े हुए वस्त्रको कन्धेपर न रखे ।
स्नानके बाद हाथोंसे शरीरको नहीं पोंछना चाहिये ।
स्नानके समय पहने हुए भीगे वस्त्रसे शरीरको नहीं पोंछना चाहिये। ऐसा करनेसे शरीर कुत्तेसे चाटे हुएके समान अशुद्ध हो जाता है, जो पुनः स्नान करनेसे ही शुद्ध होता है।
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#सनातन_धर्म_ही_सर्वश्रेष्ठ_है
#सनातन_धर्म_ही_सर्वश्रेष्ठ_है
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