मयंक Mayank میانک
मयंक Mayank میانک

@_MayankSaxena

31 Tweets 69 reads Apr 15, 2023
#Thread है, पढ़ें तो ठीक, न पढ़ें तो जैसे चल रहा है..चलेगा ही..
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कहानी एक शहर की है, जो एक मुल्क़ में है। मुल्क़ का नाम है सीरिया और शहर का नाम है अलेप्पो..अलेप्पो ऐतेहासिक शहर था, वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल शहर..
1/N
अलेप्पो की तारीख़ इंसानी बस्ती की सभ्यता जितनी ही पुरानी है। यहां खुदाई में मिली सबसे पुरानी बस्ती, ईसा से भी 5000 साल पहले की थी। ईसा से 3000 साल पहले तो इसका दर्ज किए गए इतिहास में ज़िक्र है। दुनिया में दमिश्क से भी पुराना शहर, जो आज भी है..
2/N
ख़ैर कहानी को इतने साल तो खींच नहीं सकते, लेकिन दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक..इस बेइंतिहा ख़ूबसूरत शहर को हम सीधे ले आते हैं साल 2011..जब इस कमाल शहर की आबादी करीब 25 लाख लोगों की थी..मुल्क एक खराब दौर में था..
3/N
सीरिया भी दुनिया भर की तरह आर्थिक मंदी की चपेट में फंसा हुआ था। महंगाई 3 साल से बढ़ रही थी, रोज़गार थे नहीं और लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे सड़क पर आने लगा था। तिस पर अमेरिकी खेल तो था ही, उसने तमाम कट्टरपंथी संगठनों को काम पर लगा रखा था।
4/N
एक ओर जहां विपक्ष लगातार बशर अल असद की सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने में लगा था, वहीं इस माहौल का फ़ायदा उठाने के लिए अमेरिका द्वारा समर्थित कट्टरपंथियों ने इन मुद्दों के ही बीच में, शासक परिवार के अल्पसंख्यक फ़िरके से होने को भी मुद्दा बना दिया..
5/N
इसी दौरान सीरिया में कुछ और भी घट रहा था..कट्टरपंथी गुटों का विपक्ष से भी संपर्क हो रहा था। देश भर में प्रोटेस्ट बढ़ने के बीच, मुल्क के बाहर-अंदर हथियारबंद गुट भी तैयार हो रहे थे, इसमें से कुछ लोग तो सीरियाई फ़ौज के ही लड़ाके थे पर कई सारे नौजवान थे, जिनको इस्तेमाल होना था
6/N
पहले से ही महंगाई और बेरोज़गारी से निराश नौजवान, किसी भी तरह के कट्टरपंथी एजेंडे के लिए सबसे बेहतरीन कच्चा माल होते हैं। कहा जाता है कि अमेरिकी मदद से हथियार और पैसा पाकर, सीरियन फ्री आर्मी, Levant Front और अल क़ायदा का संगठन अल नुसरा किसी और तैयारी में था..
7/N
पर हम अलेप्पो की बात कर रहे थे तो 12 अगस्त, 2011 को पूरे सीरिया में तमाम जगह सरकार के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट हुए, ये वो समय था, जब कहीं-कहीं हथियारबंद लड़ाके भी प्रोटेस्ट में दिखने लगे थे। इस समय भी अलेप्पो में शांति थी और वहां जनता ने ख़ास विद्रोही तेवर नहीं दिखाए थे।
8/N
ऐसा नहीं कि अलेप्पो में प्रोटेस्ट नहीं था पर शहर अपने मिज़ाज के मुताबिक शांत था। 12 अगस्त के प्रोटेस्ट में फिर कुछ हुआ..प्रोटेस्टर्स में से 2 को सुरक्षबलों ने गोली मार दी..इस दौरान दसियों हज़ार लोग प्रदर्शन में मौजूद थे। 12 मई तक अलेप्पो में व्यापक प्रदर्शन शुरू हो चुके थे।
9/N
पर इसके बाद भी किसी और शहर के मुक़ाबले अलेप्पो शांत रहा। लेकिन फिर क्या हुआ..साल भर में धीरे-धीरे अल-नुसरा, सीरियन फ्री आर्मी, अल तौहीद ब्रिगेड अपनी तैयारी कर रहा था। अलेप्पो के आसपास के शहरों, कस्बों के नौजवानों और फौज के डिफेक्टर्स को भर्ती किया जा रहा था।
10/N
और फिर एक साल बाद 2012 में जब अलेप्पो में सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन काफी बढ़ गए थे, अचानक से इन कथित विद्रोही फोर्सेस ने अलेप्पो में घुसना शुरु कर दिया। दूसरी ओर सरकार थी, जो हड़बड़ाहट में भूल गई थी कि सामने अपने ही नागरिक हैं..वो गलती पर गलती कर रही थी।
11/N
प्रदर्शनों में ये लोग शामिल होने लगे और स्थानीय लोगों का भरोसा हासिल करने की कोशिश करने लगे। यहां तक लोगों को न इन पर पूरा भरोसा था और न सरकार पर..लेकिन फिर स्थिति को बल से नियंत्रित करने के लिए सुरक्षाबल बढ़ने लगे, टैंक दिखने लगे और यहां से लोगों का आक्रोश बढ़ने लगा।
12/N
लोगों ने ये नहीं सोचा था कि सरकार उनको बल प्रयोग से इस तरह दबाना चाहेगी। अचानक से शहर में घुस आए हथियारबंद विद्रोहियों ने सुरक्षबलों और फौज से लोहा लेना शुरू कर दिया। 7000 के आसपास विद्रोही, 18 बटालियन्स में बंटे हुए थे। लोग ये देख कर डरे भी, हैरान भी हुए और शायद खुश भी..
13/N
विद्रोहियों से इस अचानक हमले से सुरक्षाबल और फौज को पीछे हटना पड़ा। लोगों को अचानक लगा कि ये लोग उनके मददगार हैं। इन विद्रोही दस्तों ने उनको ये ही भरोसा दिलाया। कहा गया कि अल्लाह ने उनकी मदद और आज़ादी के लिए इनको भेजा है। अलेप्पो के लोग, इनके साथ हो लिए..
14/N
शहर में सरकार को मज़ा चखाने के लिए नौजवान इन दस्तों के साथ हो लिए। शहर के अहम इलाकों का नियंत्रण इनको मिलने लगा। धीरे-धीरे फ़ौज पीछे हटने लगी और सरकार को अलेप्पो से अपना नियंत्रण छोड़ना पड़ा। लोग खुश थे, इन लड़ाकों को अपना रखवाला मान रहे थे..
15/N
इस बीच सरकार इनको ठिकाने लगाने के लिए फौज का बदतरीन इस्तेमाल कर चुकी थी। अलेप्पो के आसपास के इलाकों में बम बरसा दिए गए, टैकों का इस्तेमाल हुआ और नागरिक इससे बेहद ख़फ़ा और ख़ौफ़ज़दा भी थे। उस आक्रोश और भय में ये लोग उनको देवदूत लगने लगे..
16/N
भूख, बेरोज़गारी और सत्ता के दमन से जूझ रहे लोगों को बहकाना और धार्मिक कट्टरपंथ की ओर धकेलना सबसे आसान होता है। ऐसे वक्त में जो साथ खड़ा दिखता है, वही मसीहा हो जाता है। अलेप्पो में जंग सितंबर 2012 तक, पुराने ऐतेहासिक शहर में पहुंच चुकी थी। लेकिन क्या लोगों को छला गया?
17/N
शहर पर कब्ज़ा होते-होते, फौज के पीछे हटते-हटते पूरे शहर में लोगों के झुंड इन लड़ाकों को हीरो बनाकर घूम रहे थे। गोलियों की आवाज़ें, जश्न के शोर के साथ गूंज रही थी। लोगों को नहीं पता था कि उनके साथ अब क्या होगा, वो बस सरकार के हारने पर खुश थे..
18/N
शहर से फ़ौज के जाते ही लोगों को लगा कि अब शायद हिंसा से उनको निजात मिल गई। कुछ लोग जिनके ज़ेहन सलामत थे, वो सवाल कर रहे थे कि ये लोग कौन हैं..कहां से आए..इनको हथियार कहां से मिले और ये मज़हब की बात क्यों कर रहे हैं, मुद्दे की बात हो और कितनी हिंसा?
19/N
ये कहने वाले लोगों ने ये भी कहा कि धार्मिक नारों की ज़रूरत किसलिए है? हम महंगाई-बेरोज़गारी और कमज़ोर होते निज़ाम के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं..
ऐसे सारे लोगों के सवालों पर उस समय शक किया गया..उनको सरकार का एजेंट बताया, उनके अपने ही लोगों ने उनको अकेला कर दिया। फिर एक सुबह आई..
20/N
उस सुबह जब लोग सोकर उठे, तो शहर के अलग-अलग चौराहों पर उनको रखी गई, लटकाई गई, सजा दी गई लाशें दिखीं। पब्लिक एक्सीक्यूशन की शुरुआत तो 1 अगस्त 2012 को ही हो चुकी थी, जब असद का मुख़बिर कह के, विद्रोहियों ने कथित तौर पर 15 लोगों को मार दिया था। लेकिन ये आगे की कहानी थी..
21/N
वो ही लोग, जो पिछले एक्सीक्यूशन में विद्रोहियों के साथ थे, ये नज़ारा देखकर दहल गए थे। पूरे शहर में लाशें थी..गोलियों से मारे गए लोग, सिर काट कर मारे गए लोग..और इनकी प्रदर्शनी लगाई गई थी। बैनर्स के साथ कि सरकार के मुखबिरों का ये ही अंजाम होगा। साथ में वही नारे..धार्मिक..
22/N
इसके बाद, धीरे-धीरे अलेप्पो में ये नज़ारा आम हो गया। इसके साथ ही एक आवाज़ गलियों में गूंजने लगी, जो रात को भी सपनों में डराने लगी..वो आवाज़ थी गाड़ियों पर होते, लाउडस्पीकर्स से एलान की..ISIS का रूल, जिसमें सबको वो ही धार्मिक नियम मानने थे, जिनका एलान लाउडस्पीकर्स से होता था!
23/N
लोगों के अंदर हिम्मत भी नहीं थी कि इसके ख़िलाफ़ बोल पाते, बोलते वालों का हश्र वो सड़कों पर देख रहे थे। धार्मिक नारों के साथ, हर हत्या को पवित्र बना दिया जा रहा था। कुछ पत्रकार छिप कर, ये सब दुनिया तक पहुंचा रहे थे। उनमें से कई मारे गए, कुछ विदेश भागे..
24/N
चाहें राक्का का शहर हो या अलेप्पो, सब अब इन कट्टरपंथी हत्यारों के नियंत्रण में थे। एक वक्त में जिनके द्वारा असद के समर्थकों और कथित मुखबिरों की हत्या के समर्थन में भीड़ उतर आई थी, वे अब उसी भीड़ को, लोगों को भी वैसे ही मार रहे थे अगर वो उनके अनुसार न चलें..
25/N
सरकारी सप्लाई इनके कब्ज़ें में थी, लोग क्या खाएंगे, कैसे कपड़े पहनेंगे, औरतें घर के बाहर निकलेंगी या नहीं, क्या पहनेंगी क्या नहीं, लोग इबादत कितनी और कैसे करेंगे ये सब कुछ ये लोग तय कर रहे थे और इनके हाथ में ये ताकत किसने सौंपी थी?
26/N
उनके हाथ में ये ताकत सौंपी थी, ख़ुद आंख बंद कर के, धर्म के नशे में डूब गए लोगों ने..लोगों ने जो ये समझना छोड़ चुके थे कि सड़क पर, भीड़ के द्वारा, उन्मादी हथियारबंद लोगों द्वारा इंसाफ़ नहीं किया जा सकता। आज हम अगर भीड़ के इंसाफ़ के साथ खड़े होंगे तो एक दिन वही भीड़..
27/N
..वही उन्मादी भीड़, वही लोग जिनके हाथ में हथियार है और जो अपने हाथ से न्याय करने को उतारू हैं..आप भी उनके बीच ख़ुद को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को घिरा हुआ पाएंगे..आप बच नहीं पाएंगे..वैसे ही धार्मिक नारे लगेंगे और लोग तालियां बजाएंगे और आप की हत्या पवित्र होगी..
28/N
ये कहानी सिर्फ किसी अलेप्पो की नहीं है..सीरिया के राक्का की भी है..पाकिस्तान की भी है..नाइज़ीरिया और सर्बिया की भी है..यक़ीन मानिए कि भारत की भी है और धीरे-धीरे इस कहानी का विस्तार और भयावहता बढ़ रही है..किसी भी एक्स्ट्रा-ज्युडिशिल किलिंग पर ताली मत बजाइए..
29/N
दिन दहाड़े हत्या भले ही किसी अपराधी की हुई हो, याद रखिए कि उसे मारने वाले अगर धार्मिक नारे लगा रहे हैं तो ये सब आपको बरगलाने की कोशिश है। आपकी भावनाओं से अपनी राजनैतिक चालाकी, आपकी आज़ादी को छीनने, आपको गुलाम बनाने की साज़िश है..सत्ता..
30/N
अलेप्पों में अगले 7 साल महंगाई, बेरोज़गारी, बेहतरी की बात नहीं हुई, उन धार्मिक मसीहाओं ने कभी लोगों की भूख और गरीबी के बारे में नहीं सोचा। अपना ख्याल रखा, अय्याशी की और धर्म के नाम पर उनका ही क़त्लेआम करते रहे, जिन्होंने उनको अपना भविष्य सौंप दिया..
अंतिम मौका है, चेत जाइए!
31/N

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