“क्षमा वीरस्य भूषणम्” शिवा जी का मूल मंत्र था। विजित के ऊपर दयाभाव दिखाना वह खूब जानते थे। शिवा जी के ध्वज तले न तो कभी मुगलों का परमप्रिय ‘कत्ल-ए-आम’ हुआ और न ही रूसियों की तरह युद्ध कैदी मरवाए गए। तैमूर की तरह उन्होंने लाखो बंदियों का शिरोच्छेदन भी कभी नही कराया #शिवाजी #Thread
सिंहगढ़ विजय में जिस समय तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए उस वक्त शिवाजी नादिरशाही करा सकते थे लेकिन उन्होंने उस वक्त भी दयालुता का ही परिचय दिया। शिवाजी के सहानुभावता का उत्कृष्ट उदाहरण बिलारी दुर्ग विजय के समय मिलता है।
पराजय के बाद शिवा जी के समक्ष वीरांगना ने कहा कि ‘क्या अबलाओं पर विजय प्राप्त करना ही वीरों का धर्म है ?’ उसकी कातर दृष्टि और भावपूर्ण शब्द दुश्मनों की तोप के सम्मुख सदैव अडिग रहने वाले शिवा जी के हृदय को भेद गए।
शिवाजी महाराज ने जब वीरांगना के मुख से यह वचन सुने तो उनका हृदय गदगद हो उठा और उन्होंने दुर्ग उस वीरांगना को वापस कर दिया एवम् उसे ससम्मान वहाँ से विदा किया। जिस दुर्ग पर शिवाजी की फहराने लगी थी वहांँ पुना: बिलारी की ध्वजा फहरने लगी।
शिवाजी मानते थे कि वीरो का धर्म है युद्ध की परिस्थिति में भी पक्ष विपक्ष का ध्यान रखे बिना बच्चो और स्त्रियों की रक्षा की जाए। वें आजीवन स्त्रियों का सम्मान करते रहे। शिवाजी ने जब अफज़ल ख़ान को मारा तो उसके ‘हरम’ को अपने अधिकार में नही लिया वरन् उसे सकुशल बीजापुर भिजवा दिया था।
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