भागवत जी ने जो बोला उस पर जो भी स्पष्टीकरण आ रहे हैं, वो किसी भी तरह से तार्किक नहीं लग रहे। 'पंडित' का अर्थ अगर हम 'विद्वान' भी मानें, तब भी प्रश्न यह आता है कि क्या विद्वानों ने जातियाँ बनाईं? जातियाँ उतनी ही सनातन हैं, जितना हमारा धर्म। हाँ, वर्तमान में इसमें विकृति आई है।
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विकृति लाने वाले कौन थे? शास्त्रज्ञ विद्वान या फिर अंग्रेज, जिनकी 'रेस थ्योरी' की नौटंकी आज तक चल रही है। क्या किसी भी ग्रंथ में मुगल और अंग्रेजी शासन से पहले कथित जातियों को ले कर भेदभाव का उल्लेख है? तो ये 'विद्वान' कौन थे? जातिवाद पर चर्चा करते हुए उनका ही नाम ले लेते!
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यदि जातिवाद मिटाने की बात करनी है, तो आप ब्राह्मणों को अनंतकाल तक गरिया कर कैसे मिटा लेंगे? जातिवाद है, और जिनके पूर्वजों ने तब से आज तक इसे किसी रूप में ढोया है, उसका अपराध आज की पीढ़ी पर, वह भी सामूहिक रूप में क्यों? क्या जातिवाद के लिए आरक्षण दोषी नहीं?
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अंग्रेजों ने जब दरारें खोजना आरंभ किया तो हिन्दू-मुस्लिम तो सहज विकल्प थे, तत्पश्चात् हिन्दुओं की जातियों में द्वेष का संचार उन्हें और भी अच्छा विकल्प लगा। बिहार के गाँवों में ब्राह्मणों की गति दलितों से भी नीचे है। न आरक्षण है, न अपने गाँव में कोई काम देता है। पाप लगेगा।
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जातिवाद है और अगर सवर्णों को समझाना है तो उन्हें आप उनके अधिकारों से, वोटबैंक के कारण, वंचित मत करो। आप उन पर मानस के दोहों से ले कर हर अपराध का ठीकरा फोड़ कर सोच रहे हो कि आरक्षण से जातिवाद समाप्त हो जाएगा? यह संभव ही नहीं है। आरक्षण से द्वेष बढ़ेगा ही। आरक्षण का ढाँचा बदलो।
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मोहन भागवत जी को अपने शब्दों का चुनाव और भी परिष्कृत करना होगा क्योंकि उनके ज्ञान और अनुभव के कारण उनसे अधिक आशा है। आपके बयान का हर संभव पोस्टमॉर्टम होता रहता है, फिर संघ से जुड़े लोग 'पंडित' शब्द की व्याख्या पर बहत्तर स्पष्टीकरण देते रहते हैं।
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जातिवाद अंग्रेजों की देन है और जाति/वर्ण ब्रह्मा की। दुनिया कितनी भी वोक हो जाए, हर समाज में ऐसे ढाँचे रहेंगे ही क्योंकि मानव बिना हायरार्की के समाज का निर्माण कर ही नहीं सकता। घृणा के लिए समाज में जगह नहीं, पर ब्राह्मण को अपराधी बता कर, आप जातिवाद का समाधान नहीं पाएँगे।
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