इक़बाल की रचनाओं से पता चलता है कि २० वीं शदी के प्रारंभ में मुसलमानों के एक प्रबुद्ध वर्ग के क्या चल रहा था।उसने अपनी फारसी शब्दों की बहुलता वाली कविताओं से मुस्लिम समाज को radicalise करने का सफल प्रयास किया। उसने 1910 में तराना ए मिली (मुस्लिम कौम) की रचना की। (1/n)
(2/n) इसके बोल हैं "चीन(मध्य एशिया) ओ अरब हमारा हिंदोस्तां हमारा,मुस्लिम हैं हमवतन हैं सारा जहां हमारा।।
तौहीद (अल्लाह की अद्वितीयता) की अमानत सीनों में है हमारे,आसां नहीं मिटाना नामोनिशां हमारा।।
दुनिया के बुत कदों (मन्दिरों) मैं पहला वो घर खुदा का (काबा),
तौहीद (अल्लाह की अद्वितीयता) की अमानत सीनों में है हमारे,आसां नहीं मिटाना नामोनिशां हमारा।।
दुनिया के बुत कदों (मन्दिरों) मैं पहला वो घर खुदा का (काबा),
(3/n)
हम इसके पासबां (रक्षक) हैं,वो पासबां हमारा।।
तेगों (तलवारों) के साए में पल कर जवां हुए हैं,खंजर हिलाल (बाल चंद्र) का है कौमी निशां हमारा।।
मगरिब (मिस्र से स्पेन तक) की वादियों में गूंजी अजां (नमाज़ के लिए आवाज) हमारी,थमता न था किसी से सैल ए रवां (बाढ़ जैसा विस्तार) हमारा।
हम इसके पासबां (रक्षक) हैं,वो पासबां हमारा।।
तेगों (तलवारों) के साए में पल कर जवां हुए हैं,खंजर हिलाल (बाल चंद्र) का है कौमी निशां हमारा।।
मगरिब (मिस्र से स्पेन तक) की वादियों में गूंजी अजां (नमाज़ के लिए आवाज) हमारी,थमता न था किसी से सैल ए रवां (बाढ़ जैसा विस्तार) हमारा।
(4/n)
बातिल (अल्लाह को नहीं मानने के झुंठ) से दबने वाले ए आसमां नहीं हम, सौ बार कर चुका है तू (अल्लाह) इम्तिहां हमारा।।
ऐ गुलिस्तां ए उंदलुस (स्पेन) वो दिन है याद तुझ को था तेरी डालियों में जब आशियां हमारा।।
ऐ मौज (लहर) ए दजला तू भी पहचानती है हमको,
बातिल (अल्लाह को नहीं मानने के झुंठ) से दबने वाले ए आसमां नहीं हम, सौ बार कर चुका है तू (अल्लाह) इम्तिहां हमारा।।
ऐ गुलिस्तां ए उंदलुस (स्पेन) वो दिन है याद तुझ को था तेरी डालियों में जब आशियां हमारा।।
ऐ मौज (लहर) ए दजला तू भी पहचानती है हमको,
(5/n)
अब तक है तेरा दरिया अफसाना ख्वां (किस्से सुनाने वाला) हमारा।।
ऐ अर्ज ए पाक (मक्का मदीना) तेरी हुर्मत पे (पवित्रताके लिए) कट मरे हम, है खूं तेरी रगों में अब तक रवां (प्रवाहित) हमारा।।
सालार (leader)ए कारवां है मीर ए हिजाज़ (मुहम्मद) अपना,
अब तक है तेरा दरिया अफसाना ख्वां (किस्से सुनाने वाला) हमारा।।
ऐ अर्ज ए पाक (मक्का मदीना) तेरी हुर्मत पे (पवित्रताके लिए) कट मरे हम, है खूं तेरी रगों में अब तक रवां (प्रवाहित) हमारा।।
सालार (leader)ए कारवां है मीर ए हिजाज़ (मुहम्मद) अपना,
(6/6)
इस नाम से है बाक़ी आराम ए जां हमारा।।
इकबाल का तराना बांग ए दरा (काफिले के रवाना होने के लिए घंटी) है गोया (मानो कि) होता है जादा पैमा (रवाना)फिर कारवां हमारा ।।
And we recite this bigot’s poetry without shame.
इस नाम से है बाक़ी आराम ए जां हमारा।।
इकबाल का तराना बांग ए दरा (काफिले के रवाना होने के लिए घंटी) है गोया (मानो कि) होता है जादा पैमा (रवाना)फिर कारवां हमारा ।।
And we recite this bigot’s poetry without shame.
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