उत्कर्ष प्रताप सिंह राजावत
उत्कर्ष प्रताप सिंह राजावत

@rajawat2003

23 Tweets 15 reads Jun 03, 2022
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कन्नौज के इतिहास व #महाराज_जयचंद्र के जीवन से सम्बंधित इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है कन्नौज का इतिहास लेकिन इसमें कंही भी ऐसा कोई जिक्र नही है कि महाराज जयचंद किसी भी प्रकार गलत थे पर वर्तमान के देशद्रोहियों ने एक धर्मपरायण
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राजा को बदनाम कर डाला #देश_भक्त महाराजा #जयचंद्र__गहरवार
जयचन्द्र (जयचन्द), महाराज विजयचन्द्र जी के पुत्र थे। ये कन्नौज के राजा थे जयचन्द का राज्याभिषेक वि.सं. १२२६ आषाढ शुक्ल ६ (ई.स. ११७० जून) को हुआ।राजा जयचन्द पराक्रमी शासक थे उसकी विशाल सैन्य वाहिनी सदैव विचरण
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करती रहती है इसलिए महाराज जयचंद जी को ‘ #_दळ-#_पंगुळ' भी कहा जाता है। इसका गुणगान #_पृथ्वीराज_रासो में भी हुआ है।
राजशेखर सूरि ने अपने प्रबन्ध-कोश में कहा है कि काशीराज जयचन्द्र विजेता था और गंगा-यमुना दोआब तो उसका विशेष रूप से अधिकृत प्रदेश था।
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नयनचन्द्र ने रम्भामंजरी में जयचन्द को #_यवनों_का_नाश करने वाला कहा है।
युद्धप्रिय होने के कारण इन्होंने अपनी सैन्य शक्ति ऐसी बढ़ाई की वह #_अद्वितीय हो गई,
जिससे जयचन्द को #_दळ_पंगुळ' की उपाधि से जाना जाने लगा।
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जब ये युवराज थे तब ही अपने पराक्रम से कालिंजर के चन्देल राजा #_मदन_वर्मा को परास्त किया।
राजा बनने के बाद अनेकों विजय प्राप्त की। जयचन्द ने सिन्धु नदी पर मुसलमानों (सुल्तान, गौर) से ऐसा घोर संग्राम किया कि रक्त के प्रवाह से नदी का नील जल एकदम ऐसा लाल हुआ
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मानों अमावस्या की रात्रि में ऊषा का अरुणोदय हो गया हो (रासो)।
यवनेश्वर सहाबुद्दीन गौरी को जयचन्द्र ने कई बार रण में पछाड़ा (विद्यापति-पुरुष परीक्षा) । रम्भामञ्जरी में भी कहा गया है कि जयचन्द्र ने यवनों का नाश किया। उत्तर भारत में उसका विशाल राज्य था।
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उसने अणहिलवाड़ा (गुजरात) के शासक सिद्धराज को हराया था। अपनी राज्य सीमा को उत्तर से लेकर दक्षिण में नर्मदा के तट तक बढ़ाया था। पूर्व में बंगाल के लक्ष्मणसेन के राज्य को छूती थी।
तराईन के युद्ध में गौरी ने पृथ्वीराज चौहाण को परास्त कर दिया था।
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इसके परिणाम स्वरूप दिल्ली और अजमेर पर मुसलमानों का आधिपत्य हो गया था।
यहाँ का शासन प्रबन्ध गौरी ने अपने मुख्य सेनापति ऐबक को सौंप दिया और स्वयं अपने देश चला गया था। तराईन के युद्ध के बाद भारत में मुसलमानों का स्थायी राज्य बना। ऐबक गौरी का प्रतिनिधि बनकर यहाँ से
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शासन चलाने लगा।
इस युद्ध के दो वर्ष बाद गौरी दुबारा विशाल सेना लेकर भारत को जीतने के लिए आया।
इस बार उसका कन्नौज जीतने का इरादा था। कन्नौज उस समय सम्पन्न राज्य था।
गौरी ने उत्तर भारत में अपने विजित इलाके को सुरक्षित रखने के अभिप्राय से यह आक्रमण किया।
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वह जानता था कि बिना शक्तिशाली कन्नौज राज्य को अधीन किए भारत में उसकी सत्ता कायम न रह सकेगी ।
तराईन के युद्ध के दो वर्ष बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने जयचन्द पर चढ़ाई की।
सुल्तान शहाबुद्दीन रास्ते में पचास हजार सेना के साथ आ मिला।
मुस्लिम आक्रमण की सूचना मिलने पर
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जयचन्द भी अपनी सेना के साथ युद्धक्षेत्र में आ गया।
दोनों के बीच इटावा के पास ‘चन्दावर नामक स्थान पर मुकाबला हुआ।
युद्ध में राजा जयचन्द हाथी पर बैठकर सेना का संचालन करने लगा।
इस युद्ध में जयचन्द की पूरी सेना नहीं थी। सेनाएँ विभिन्न क्षेत्रों में थी,
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जयचन्द के पास उस समय थोड़ी सी सेना थी। दुर्भाग्य से जयचन्द के एक तीर लगा, जिससे उनका प्राणान्त हो गया, युद्ध में गौरी की विजय हुई। यह युद्ध वि.सं. १२५० (ई.स. ११९४) को हुआ था।
जयचन्द पर देशद्रोही का आरोप लगाया जाता है।
कहा जाता है कि
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उसने पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए गौरी को भारत बुलाया और उसे सैनिक संहायता भी दी वस्तुत: ये आरोप निराधार हैं।
ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिससे पता लगे कि जयचन्द ने गौरी की सहायता की थी। गौरी को बुलाने वाले देश द्रोही तो दूसरे ही थे जिनके नाम पृथ्वीराज रासो में अंकित हैं।
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संयोगिता प्रकरण में पृथ्वीराज के मुख्य-मुख्य सामन्त काम आ गए थे। इन लोगों ने गुप्त रूप से गौरी को समाचार दिया कि पृथ्वीराज के प्रमुख सामन्त अब नहीं रहे, यही मौका है। तब भी गौरी को विश्वास नहीं हुआ, उसने अपने दूत फकीरों के भेष में दिल्ली भेजे।
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ये लोग इन्हीं लोगों के पास गुप्त रूप से रहे थे। इन्होंने जाकर #_गौरी_को_सूचना दी, तब जाकर गौरी ने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था।
👉 गौरी को भेद देने वाले थे
1- नित्यानन्द खत्री,
2- प्रतापसिंह जैन,
3- माधोभट्ट तथा
4- धर्मायन कायस्थ जो तेंवरों के कवि
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(बंदीजन) और अधिकारी थे (पृथ्वीराज रासो-उदयपुर संस्करण)। समकालीन इतिहास में कही भी जयचन्द के बारे में उल्लेख नहीं है कि उसने गौरी की सहायता की हो।
यह सब आधुनिक इतिहास में कपोल कल्पित बातें हैं। जयचन्द का पृथ्वीराज से कोई वैमनस्य नहीं था।
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संयोगिता प्रकरण से जरूर वह थोड़ा कुपित हुआ था।जबकि संयोगिता महाराजा जयचन्द जी की #सगी बेटी नही थी ! महाराजा जयचन्द ने संयोगिता को बेटी समान मानते थे !
उस समय पृथ्वीराज, जयचन्द की कृपा से ही बचा था।
संयोगिता हरण के समय जयचन्द ने अपनी सेना को आज्ञा दी थी
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कि इनको घेर लिया जाए।
लगातार पाँच दिन तक पृथ्वीराज को दबाते रहे। पृथ्वीराज के प्रमुखप्रमुख सामन्त युद्ध में काम आ गए थे। पाँचवे दिन सेना ने घेरा और कड़ा कर दिया। जयचन्द आगे बढ़ा वह देखता है कि पृथ्वीराज के पीछे घोड़े पर संयोगिता बैठी है। उसने विचार किया कि संयोगिता ने
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पृथ्वीराज का वरण किया है। अगर मैं इसे मार देता हूँ तो बड़ा अनर्थ होगा, बेटी विधवा हो जाएगी। उसने सेना को घेरा तोड़ने का आदेश दिया तब कहीं जाकर पृथ्वीराज दिल्ली पहुँचा।
फिर जयचन्द ने अपने पुरोहित दिल्ली भेजे, जहाँ विधि-विधान से पृथ्वीराज और संयोगिता का विवाह सम्पन्न हुआ।
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पृथ्वीराज और गौरी के युद्ध में जयचन्द तटस्थ रहा था।
जबकि आनंद शर्मा जैसे इतिहासकार और कई इतिहासकार यह दावा करते हैं कि धर्म परायण महाराजा जय चंद्र जी की कोई बेटी ही नहीं थी !
क्योंकि कोई तथ्य प्राप्त नहीं होते हैं उनकी किसी बेटी होने का..
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इस युद्ध में पृथ्वीराज ने उससे सहायता भी नहीं माँगी थी। पहले युद्ध में भी सहायता नहीं माँगी थी। अगर पृथ्वीराज सहायता माँगता तो जयचन्द सहायता जरूर कर जाते ।
अगर जयचन्द और गौरी में मित्रता होती तो बाद में गौरी जयचन्द पर आक्रमण क्यों करता ?
अतः यह आरोप मिथ्या है।
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पृथ्वीराज रासो में यह बात कहीं नहीं कही गई कि जयचन्द ने गौरी को बुलाया था।
इसी प्रकार समकालीन फारसी ग्रन्थों में भी इस बात का संकेत तक नहीं है कि जयचन्द ने गौरी को आमन्त्रित किया था।
यह एक सुनी-सुनाई बात है जो एक रूढी बन गई है।
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नोत्र : राजा जयचंद गद्दार नहीं, निर्दोष थे, वे दुष्प्रचार के शिकार हुए| ..
महाराजा जयचन्द जी एक धर्मपरायण देशभक्त महाराजा थे!
यह सभी इतिहासकार यही कहते है , वह भी पूरे #प्रमाण के साथ कि महाराजा जयचन्द जी एक धर्मपरायण देशभक्त महाराजा थे !!
#जितेन्द्र_सिंह_संजय( साहित्यकार)
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