"सात्वत पुत्र भीम के एक पुत्र का नाम वषिनी था वसुदेव के पिता शूरसेन उन्हीं के वंश में पैदा हुए थे ।महाराज शूरसेन ने अपने नाम पर शौर पुर(आधुनिक बटेश्वर)बसा कर अपना पृथक राज्य स्थापित किया था ।यह महाराज वासुदेव के पिता शूरसेन अधक वंशीय महाराज उग्रसेन के समकालीन थे।
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इन इन्ही वसुदेव जी को उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री तथा कंस की चचेरी बहिन देवकी जी व्याही थी जिनके भगवान श्री कृष्ण जी हुये ।
बलराम जी वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी जी से पैदा हुये।
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बलराम जी वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी जी से पैदा हुये।
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मधुवन(आधुनिक मथुरा) पर यदुवंशी क्षत्रियों का शासन !!
यदुवंशियों का राज्य मधुवन(आधुनिक मथुरा) हुआ करता था जिसके शासक सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्र मधु महाराज थे,इन्ही मधु का पुत्र लवण था जिसके अत्याचारों से तत्कालीन जनता का बहुत उत्पीड़न हुआ था ।भगवान राम ने अपने भाई शत्रुघ्न
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यदुवंशियों का राज्य मधुवन(आधुनिक मथुरा) हुआ करता था जिसके शासक सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्र मधु महाराज थे,इन्ही मधु का पुत्र लवण था जिसके अत्याचारों से तत्कालीन जनता का बहुत उत्पीड़न हुआ था ।भगवान राम ने अपने भाई शत्रुघ्न
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को लवण से युद्ध करने और उसे राज्यच्युत करने भेजा था ।लवण उस युद्ध में मारा गया ।
शत्रुघ्न ने मथुरा नगर वहां बसाया,
शत्रुघ्न जी ने 12 वर्ष मथुरा पर स्वयं राज्य करके अपने पुत्र शूरसेन को वहां का राजा बना दिया ।उस समय आनर्त प्रदेशपर जो यदुवंशी क्षत्रिय शाखा राज्य कर रही थी
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शत्रुघ्न ने मथुरा नगर वहां बसाया,
शत्रुघ्न जी ने 12 वर्ष मथुरा पर स्वयं राज्य करके अपने पुत्र शूरसेन को वहां का राजा बना दिया ।उस समय आनर्त प्रदेशपर जो यदुवंशी क्षत्रिय शाखा राज्य कर रही थी
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उसकेअन्तर्गतं सात्वत पुत्र भीम जो भगवान रामचन्द्र जी के समकालीन था ।
शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन मथुरा प्रदेश पर अपना आधिपत्य अधिक काल तक स्थिर नहीं रख सके।यदुवंशी राजा सात्वत भीम ने भगवान श्री राम के बाद उसे शीघ्र ही अपदस्थ कर दिया ।इसके बाद मथुरा में यदुवंशी राजा भीम के पुत्र
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शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन मथुरा प्रदेश पर अपना आधिपत्य अधिक काल तक स्थिर नहीं रख सके।यदुवंशी राजा सात्वत भीम ने भगवान श्री राम के बाद उसे शीघ्र ही अपदस्थ कर दिया ।इसके बाद मथुरा में यदुवंशी राजा भीम के पुत्र
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अंधक का राज्य हुआ उस के समकालीन अयोध्या में प्रभु श्री राम के पुत्र कुश का राज्य था ।
इसके बाद मथुरा में अंधक वंशीय यादव शाखा के क्षत्रिय राजाओं का राज्य कई " पीढ़ीयों तक चलता रहा ।
महाराज उग्रसेन तथा उनका पुत्र कंस अंधक वंशी थे ।सात्वत पुत्र भीम के एक पुत्र का नाम वषिनी था
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इसके बाद मथुरा में अंधक वंशीय यादव शाखा के क्षत्रिय राजाओं का राज्य कई " पीढ़ीयों तक चलता रहा ।
महाराज उग्रसेन तथा उनका पुत्र कंस अंधक वंशी थे ।सात्वत पुत्र भीम के एक पुत्र का नाम वषिनी था
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वसुदेव के पिता शूरसेन उन्हीं के वंश में पैदा हुए थे।
महाराज शूरसेन ने अपने नाम पर शौर पुर (आधुनिक बटेश्वर)बसा कर अपना पृथक राज्य स्थापित किया था
यह महाराज वासुदेव के पिता शूरसेन अंधक वंशीय महाराज उग्रसेन के समकालीन थे,इन इन्ही वसुदेव जी को उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री
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महाराज शूरसेन ने अपने नाम पर शौर पुर (आधुनिक बटेश्वर)बसा कर अपना पृथक राज्य स्थापित किया था
यह महाराज वासुदेव के पिता शूरसेन अंधक वंशीय महाराज उग्रसेन के समकालीन थे,इन इन्ही वसुदेव जी को उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री
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तथा कंस की चचेरी बहिन देवकी जी ब्याही थी जिनके भगवान श्री कृष्ण जी हुये। बलराम जी वासुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी जी से पैदा हुये।
श्री बज्रनाभ जी जो की श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र थे उनको पांडवों ने जब समस्त यदुवंशी क्षत्रिय द्वारिका में मारे गये थे तब मथुरा लाकर
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श्री बज्रनाभ जी जो की श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र थे उनको पांडवों ने जब समस्त यदुवंशी क्षत्रिय द्वारिका में मारे गये थे तब मथुरा लाकर
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शूरसेनाधिपति के रूप में मथुरा का राजा बनाया था ।इनसे से ही समस्त शूरसैनी।सैनी शाखा के यदुवंशी क्षत्रियों का वंश चला है।
शूरसेन महाजनपद (प्राचीन ब्रज)!
यह अंधक-वृषणी नामक दो गोत्रों के यदुवंशी क्षत्रियों के दो गण राज्यों का परिसंघ था।
1-शूरसेन मंडल -इसकी की राजधानी आगरा
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शूरसेन महाजनपद (प्राचीन ब्रज)!
यह अंधक-वृषणी नामक दो गोत्रों के यदुवंशी क्षत्रियों के दो गण राज्यों का परिसंघ था।
1-शूरसेन मंडल -इसकी की राजधानी आगरा
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जिलेमें यमुना किनारे बसे हुये शौरपुर नामक नगर थी जो आजकल बटेश्वर कहलाता है जिसमे वृषणी गोत्र (भगवान कृष्ण के गोत्र) के यदुवंशी के क्षत्रिय रहते थे यहां के शासक श्री कृष्ण के दादा महाराज शूरसेन (वासुदेव जी के पिता) थे
2-मथुरा मंडल--मथुरा मंडल की राजधानी मथुरा नगरी थी जिसमे
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2-मथुरा मंडल--मथुरा मंडल की राजधानी मथुरा नगरी थी जिसमे
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अंधक गोत्र के यदुवंशी क्षत्रिय रहते थे ।महाराज उग्रसेन (कंस के पिता ओर देवकी जी के काका) मथुरा मंडल के शासक थे। बाद में कंस ने अपने पिता महाराज उग्रसेन को गद्दी से हटा कर जेल में डाल दिया और स्वयं अंधक वंशी यदुवंशियों के मथुरामण्डल का शासक वन गया।
जब श्री कृष्ण जी ने अपने
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जब श्री कृष्ण जी ने अपने
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मामा कंस को मार दिया तो भगवान श्री कृष्ण के कारण यदुवंश गौरवशाली हुआ। श्री कृष्ण जी के दादा महाराज शूरसेन के नाम से यह ब्रज प्रदेश पुनः अंधक ओर वृषणी गोत्रों के दोनों गण राज्यों को मिला कर शूरसेन महाजनपद के नाम से जाना गया तथा श्री कृष्ण जी ने महाराज उग्रसेन को इस शूरसेन
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महाजनपद का राजप्रमुख बनाया और श्री कृष्ण इस संघ के प्रमुख नेता बनाये गये। कंस का श्री कृष्ण जी के द्वारा मारे जाने के बाद से जरासंध श्री कृष्ण जी को अपना शत्रु समझने लगा ।उसने कस की मृत्यु का बदला लेने के लिए विशाल सेना सहित कई बार मथुरा पर आक्रमण किये परन्तु प्रत्येक बार उसे
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बिफल होकर वापिस लौटना पड़ा। सत्रहवीं बार उसने कालयवन की सेनाओं सहित आक्रमण करने की योजना बनाई जब इस युद्ध की सूचना अंधक-व्रषनी संघ के लोगों को मिली तब संघ के कुछ नेताओं ने कहा कि जरासंध के आक्रमणों की समस्या श्री कृष्ण से जरासंध की व्यक्तिगत शत्रुता है अर्थात श्री कृष्ण के
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कारण संघ को जरासंच से युद्ध करना पड़ रहा है ।श्री कृष्ण जीने इस अपवाद पर बड़ा नीतिज्ञतापूर्ण कदम उठाया ।
उन्होंने सजातीय भाइयों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन यदुवंशी भाइयों को बजह से मधुरा पर जरासंध के आक्रमण होते है उन्हें मथुरा छोड़ देनी चाहिए ।उनकी यह राय बहुत लोगों को
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उन्होंने सजातीय भाइयों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन यदुवंशी भाइयों को बजह से मधुरा पर जरासंध के आक्रमण होते है उन्हें मथुरा छोड़ देनी चाहिए ।उनकी यह राय बहुत लोगों को
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पसंद आयी और थोड़े से र महा-भोजियों गोत्र के यदुओ के अतिरिक्त समस्त अंधक-वर्षनी संघ के यदुवंशी श्री कृष्ण के साथ मथुरा का परित्याग करने को उद्धत हो गये । इस योजना को इतिहास में "महाभिनिष्क्रमण "कहते है ।पुनर्वास के लिए द्वारिकापुरी उपयुक्त समझी गई ।वह स्थान दूर होने के कारण
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जरासंध की पहुंच सेबाहर था ।योजना वद्ध तरीके से श्री कृष्ण अपने यदुवंशी भाइयों सहित जरासंध से बच कर रास्ते में मुचकुंद जी के द्वारा कालयवन को मरवा कर द्वारिका इस प्रकार पहुंचे ।इधर जरासंध ने आक्रमण कर मथुरा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया ।वहाँ पर जो कुकुर भोजवंशी
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यादव क्षत्रिय थे उन्होंने जरासंध से सन्धि कर ली।श्री कृष्ण के द्वारिकापुरी पहुंचने पर वहां बड़ी उन्नति हुई ओर बहुत ही वैभवशाली नगरी हो गई ।श्री कृष्ण जी के तत्वावधान में द्वारिकापुरी में एक सुद्रढ़ यादव क्षत्रिय गणराज्य की स्थापना हो गई,जिसके वैभव और शक्ति सम्पन्नता की ख्याति
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सारे देश में फैल गई।
“यदुवंशी(पौराणिक यादव) राजपूतों की अन्य शाखा व उपशाखायें !!
जब अर्जुन ने यदुवंशियों को द्वारिका से पचनंद (पंजाब)में बसाया था तो उन्होंने अपने आप को अपने पूर्वजों के नाम से अलग अलग शाखाओं में विभाजित कर लिया जिनमें मुख्यरूप से शूरसेनी शाखा के सैनी
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“यदुवंशी(पौराणिक यादव) राजपूतों की अन्य शाखा व उपशाखायें !!
जब अर्जुन ने यदुवंशियों को द्वारिका से पचनंद (पंजाब)में बसाया था तो उन्होंने अपने आप को अपने पूर्वजों के नाम से अलग अलग शाखाओं में विभाजित कर लिया जिनमें मुख्यरूप से शूरसेनी शाखा के सैनी
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(हरियाणा पंजाब हिमाचल जम्बू
क्षेत्र के यदुवंशी क्षत्रिय) जादौन,बनाफर,काबा,जाडेजा,भाटी,हाल छौंकर.जस्सा,उनड़,केलण,रावलोत चुडासमा.सरबैया,रायजादा,पाहू.पुंगलिया जैसवार,पोर्च,बरगला.जादव,जसावत बरेसरी,आदि आते है।
बृज क्षेत्र में या को जा बोलते हैं इसलिए यादव अपभ्रंश होकर जादों हो गया !!
क्षेत्र के यदुवंशी क्षत्रिय) जादौन,बनाफर,काबा,जाडेजा,भाटी,हाल छौंकर.जस्सा,उनड़,केलण,रावलोत चुडासमा.सरबैया,रायजादा,पाहू.पुंगलिया जैसवार,पोर्च,बरगला.जादव,जसावत बरेसरी,आदि आते है।
बृज क्षेत्र में या को जा बोलते हैं इसलिए यादव अपभ्रंश होकर जादों हो गया !!
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